वक्त की बही तुम्हारे पलो का हिसाब
हर पल को जीआ है तुमने मेरी खुशियो की खातिर
फिर भी मैं कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नहीं देती
पो फटने के साथ ही शुरू हो जाता है वक्त को पीछे छोड़ने का संघर्ष
खुद को भूल जाती हो बच्चो को हर शै याद दिलाने की खातिर
फिर भी मैं कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नही देती
घर आँगन में फैली तुम्हारी जलाई अगरबत्ती की सुगंध
बता जाती है उन दुआओ के बारे मे जो मांगी होती है परिवार की खातिर
फिर भी मै कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नही देती
ताकत तो इतनी नहीं होती उस चाय के एक कप में
बेफिक्र रहती हो फिर भी तुम खुद से , सब की भूख मिटाने की खातिर
फिर भी मै कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नही देती
आईना दिखाई देता है तेरी खूबसूरती का घर की हर चीज के अन्दर
क्योंकि दिल की हर कलाकृति उतार देती हो मेरे घर को स्वर्ग बनाने की खातिर
फिर भी मै कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नही देती
उलझनो के ढेर पर बैठ जब तेरी मुस्कराहटो की छाॅव ढुढता हूँ
अपनी सारी थकावट को आँचल में छुपा लेती हो मेरे लिए मुस्कान बिछाने की खातिर
फिर भी मै कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नही देती
ढलते ही रात , मेरे बालो को सहलाते हुई तुम्हारी ऊँगलियाॅ ये कह जाती है
केवल वक्त ही नही , सम्पूर्णता को अर्पित किया था मैने इक वचन की खातिर
वक्त से तो मैने कभी मोहलत भी नही मांगी कि सोचे किसी और की खातिर
अहसास होता है तब बात सुन तेरी, इक ग्लानि सी होती है मन में
सोचता हुॅ
मै क्यों कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नही देती
मै क्यों कहता हुॅ कि तुम मुझे वक्त नही देती