कल्पना कविता की बुनियाद होती है ,परन्तु मेरी रचनाये किसी कल्पना से नहीं मेरे जीवन के यथार्थ से जुडी है | सुख दुःख के मोतिओं को पिरो कर बनी ये माला आपकी नज़र
Friday, 30 October 2020
होशियारी(Smartness)
देखने वालों ने चिंगारी देखी
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
झूठ ना कह पाया कभी,
ना तोङा दिल कभी किसी का,
फिर भी मुझमें मेरे अपनो ने मक्कारी देखी,
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
झुकती रही कमर,
जिन्दगी के बोझ से
झुकती रही नजर,
अहसानों के बोझ में,
मेरी खामोशी में भी अपनो ने जुबांतरारी देखी
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
कुछ कर गुजरने की उम्मीद में,
न जाने क्या क्या कर गए हम
जिन्दगी में मुकाम हासिल करते करते,
कईओ की नजरों से उतर गए हम
मिल बैठने में भी अब तो लोगो की नागवारी देखी,
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
टूट गया हूं मैं,
कोई तो आकर संभाले मुझको
चीर कर सीना धरती का,
आंचल में छुपा ले मुझको ,
वज़ह तो न बन पाया किसी के सकूं की,
क़ोई बेवजह ही गले से लगा ले मुझको ।
क़ोई बेवजह ही गले से लगा ले मुझको ।
वफ़ादारी की इंतेहा के बाद जब मिलीं नजरें
उन नजरों में भी न इक पल की शुक्रगुज़ारी देखी ।
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी।
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
Wednesday, 7 October 2020
50th Marriage Anniversary of Res. papaji Mummy ji
ਬਾਬੁਲ ਤੇਰੀ ਛਤਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ।
ਤੇਰਾ ਆਚਲ ਜਿਵੇਂ ਸਾਵਣ ਦੀ ਬਦਰੀ,
ਮਾਏ ਤੇਰੀ ਬਦਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ ।
ਤੇਰੇ ਖੱਬ ਨੇ ਦੂਆਵਾ ਦੀ ਛਤਰੀ,
ਬਾਬੁਲ ਤੇਰੀ ਛਤਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ।
ਤੇਰਾ ਆਚਲ ਜਿਵੇਂ ਸਾਵਣ ਦੀ ਬਦਰੀ,
ਮਾਏ ਤੇਰੀ ਬਦਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ ।
ਤੇਰੇ ਹਥਾਂ ਵਿਚ ਬਚਪਨ ਖੇਡਿਆ,
ਆਚਲ ਵਿੱਚ ਮਾਣੀ ਜਵਾਨੀ।
ਦੂਆ ਤੁਹਾਡੀ ਨਾਲ ਪਰਿਵਾਰ ਵਧਿਆ,
ਪਰ ਤੁਹਾਡੀ ਭੁਲ ਨ ਸਕਾਂ ਕੁਰਬਾਨੀ ।
ਔਖੇ ਵੇਲੇ ਤੁਸੀਂ ਬਾਂਹ ਸਦਾ ਪਕੜੀ,
ਨ ਹੋਣ ਦਿੱਤੀ ਕਦੇ ਕੋਈ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ ।
ਸੀਤਾ ਰਾਮ ਸਰੂਪ ਯੁਗਲ ਜੋੜੀ,
ਰੱਬਾ ਏ ਜੋੜੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ ।
ਤੇਰੇ ਖੱਬ ਨੇ ਦੂਆਵਾ ਦੀ ਛਤਰੀ,
ਬਾਬੁਲ ਤੇਰੀ ਛਤਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ।
ਤੇਰਾ ਆਚਲ ਜਿਵੇਂ ਸਾਵਣ ਦੀ ਬਦਰੀ,
ਮਾਏ ਤੇਰੀ ਬਦਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ ।
ਹੱਥ ਜੋੜਦੀ ਵੀਰਾਂ ਅੱਗੇ,
ਬੁੱਝੋ ਕਿਊ ਏ ਮੇਲਾ ਹੋਇਆਂ ।
ਸਾਂਝ ਪੈ ਗਈ ਉਮਰਾਂ ਦੀ ਹੁਣ,
ਸੇਵਾ ਦਾ ਇਹ ਵਿਹਲਾ ਹੋਇਆ ।
ਉੱਚਾ ਬੋਲ ਜੇ ਬੋਲ ਵੀ ਦੇਣ ਤਾਂ ,
ਤੁਸਾਂ ਨਾ ਕੌੜਾ ਬੋਲਿਔ ।
ਕਬੀਲਦਾਰੀ ਦੇ ਆਣੇ ਜਾਣੇ,
ਰਲਮਿਲ ਆਪ ਨਿਭਾਲਿਔ।
ਧਰਮ ਕਰਮ ਵਿੱਚ ਧਿਆਨ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਲੱਗੇ
ਏਸੇ ਵਸੀਲੇ ਤੁਸੀਂ ਬੜਾਇਔ ।
ਏਹ ਨੇ ਵੇਹੜੇ ਵਿੱਚ ਬੋਹੜ ਦੀ ਛਾਂ,
ਰੱਬਾ ਏਹ ਛਾਂ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ ।
ਤੇਰੇ ਖੱਬ ਨੇ ਦੂਆਵਾ ਦੀ ਛਤਰੀ,
ਬਾਬੁਲ ਤੇਰੀ ਛਤਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ।
ਤੇਰਾ ਆਚਲ ਜਿਵੇਂ ਸਾਵਣ ਦੀ ਬਦਰੀ,
ਮਾਏ ਤੇਰੀ ਬਦਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ ।
ਮਾਏ ਤੇਰੀ ਬਦਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ।
ਮਾਏ ਤੇਰੀ ਬਦਰੀ ਸਦਾ ਬਣੀ ਰਹੇ।
तेरे खंभ ने दुआवा दी छतरी
बाबुल तेरी छतरी सदा बनी रहे
तेरा आंचल जीवें सावण दी बदरीमाऐ तेरी बदरी सदा बनी रहे
तेरे खंभ ने दुआवा दी छतरी
बाबुल तेरी छतरी सदा बनी रहे
तेरा आंचल जीवे सावण दी बदरी
माऐ तेरी बदरी सदा बनी रहे
तेरे हथां विच बचपन खेङिआ
आंचल विच माढी जवानी
दूआ तुहाङी नाल परिवार वधिआ
पर तुहाङी भुल न सकां कुर्बानी
औखे वेले तुसी बांह सदा पकङी
न हौन दित्ती कदे परेशानी
सीताराम सरूप युगल जौङी
रब्बा ऐ जौङी सदा बनी रहे
तेरे खंभ ने दुआवा दी छतरी
बाबुल तेरी छतरी सदा बनी रहे
हथ जौङदी वीरां अगे
बुझौ क्यु ऐह मेला होईआ
सांझ पै गई उमरां दी हुन
सेवा दा एह वेहला होईआ
ऊच्चा बोल जे बोल वी देन तां
तुसा ना कौङा बोलिओ
कबीलदारी दे आढे जाढे
रलमिल आप निबेङिईओ
धरमकरम विच धिआन ईनां दा लगे
ऐसा वसीला बङाईऔ
ऐह ने वेहङे विच बोहढ दी छांव
रब्बा ऐह छां सदा बनी रहे
तेरे खंभ ने दुआवा दी छतरी
बाबुल तेरी छतरी सदा बनी रहे
Monday, 11 May 2020
Lokniti first anniversary
पलों के छोटे कदमों ने,
महीनों के पंख लगा कर,
आज सालों की उड़ान पकड़ी है।
सालगिरह के पहले पड़ाव पर,
इतनी सी दुआ हम सब की है।
प्रभु कृपा की नजर बनी रहे,
खुशियों से झोलियां भरी रहें।
फूलों से महकता आंचल हो,
सुखों का बरसता सावन हो।
निश्छल हृदय मानो दर्पण हो,
प्रेम की परिभाषा समर्पण हो।
धन वैभव से घर भरा रहे,
हर्षोल्लास से मन हरा रहे।
कृष्ण हो सारथी ग्रहस्थ रथ के,
हनुमंत हो कवच जीवन पथ के।
दुआ है उस मालिक के चरणो में,
आस्था से ना कभी किनारा हो।
हर मोड़ पर तेरा ही सहारा हो,
हर मोड पर तेरा ही सहारा हो।
Friday, 10 January 2020
फरियाद 14/9/1999
फटिया कलेजा मेरा फेर वी मैं रोई ना,
सबना नुं वीर दित्ते मेरा वीर कोई ना
खेडढ नुं खिडोढे दित्ते,
दित्ता न वीर ऐ
खेडी कली खिडोढेयाँ नाल,
कादी मेरी तकदीर है
लकिरां दियां गुझलां विच,
मेरे वीर दी लकीर कोई ना
सबना नुं वीर दित्ते मेरा वीर कोई ना
तरले तां बहोते पाऐ,
कीतियां ने मिन्नतां बथेरियां
सच्ची जे मां तू होन्दी,
भर जांदियां अखां ऐ तेरियां
पर बुतां दिआ अखां विचों ,
वगिया कदि नीर कोई ना
सबना नुं वीर दित्ते मेरा वीर कोई ना
मापे मेरे आखदे,
धीआं पुतां समान हैं
फिर वी धिआं छड जांदियां,
कैसा ऐह विधान है
मैं ना जावां छड मापे,
मेरे ते ज़माने दी जंजीर कोई ना
सबना नुं वीर दित्ते मेरा वीर कोई ना
जान दी जे कमी होऐ,
मेरी जान मंग लै
रुह जे कम्म आंदी होऐ,
मेरी रुह कढ लै
वीर बनदा होऐ जे मेरे बाझो,
तां मेरे वरगी तकदीर कोई ना
सबना नुं वीर दित्ते मेरा वीर कोई ना
फटिया कलेजा मेरा फेर वी मैं रोई ना,
सबना नुं वीर दित्ते मेरा वीर कोई ना
सबना नुं वीर दित्ते मेरा वीर कोई ना
Thursday, 9 January 2020
कृपादृष्टि
|| प्रभु मैं जानता हूँ आपकी असीम कृपादृष्टि लगातार मेरी और लगी हुई है आप मुझे आशीर्वाद देवें ताकि मैं आपका निरंतर सिमरन करते हुए उसकी अनुभूति कर सकूं ||
वैष्णव कौन (Who is vegetarian)
आज हम अगर किसी से पूछते है कि भाई आप शाकाहारी है या मासाहारी तो वह यदि मांस का सेवन न करता होगा तो वह कह देगा कि हम तो शाकाहारी है और यदि पूछा जाये कि क्या आप वैष्णव है तो मांस न खाने वाले तपाक से कहेगे हाँ हम वैष्णव है हम मांस मिदरा का सेवन बिलकुल नहीं करते अब यहाँ सवाल यह उठता है कि हर शाकाहारी प्राणी वैष्णव है ? आखिर वैष्णव की परिभाषा क्या है ? गीता में बड़े सुंदर ढंग से वैष्णव के बारे में समझाया गया है "जो प्राणी शरीर मन और वाणी से किसी की हिंसा नहीं करता है वह वैष्णव है " यहाँ पर तीन तरह की हिंसा का उल्लेख हुआ है १: शारीरक हिंसा,मानिसक हिंसा तथा वाणिक हिंसा |
शारीरक हिंसा अर्थार्त अपने शरीर के किसी भी अंग हाथ पैर आदि से किसी को चोट पहुचाना या उसे मारना मानिसक हिंसा अर्थार्त अपने मन में किसी के लिए भी इर्षा द्वेष रखना | मान लो हमने मन में यह विचार किया कि अमूक आदमी का बुरा हो जाये या वह बहुत तर्रकी कर रहा है, भगवान करे उसका काम बिगड़ जाये तो इसमें आपने शारीरक रूप से तो कुछ नहीं किया परंतु मन में इस तरह का विचार रखकर एक तरह से हिंसा ही की है तीसरी प्रकार की हिंसा वाणी की हिंसा बताई गयी है किसी को कहे गए कठोर शब्द जिस से सामने वाले को मानिसक रूप से नुक्सान पहुंचे या अपने अभिमान में कहे शब्द या किसी की निंदा के लिए कहे शब्द चाहे वह उसके पीछे ही क्यूँ न कहे गए हो एक तरह की हिंसा ही है |
गीता में इन तीनो प्रकार की हिंसा का त्याग करने वाले को ही वैष्णव कहा गया है | केवल शाकाहारी होने से ही इंसान वैष्णव नहीं हो जाता | मान लीजिए आप मांस का सेवन तो नहीं करते परन्तु आपके मन में अभिमान ईर्षा द्वेष ने घर बना रखा है और वाणी मैं कठोरता हैं तो ऐसा शाकाहारी होना भी किस काम का ?
अब यहाँ सवाल यह उठाया जाता है कि इतनी परिपवक्ता आये कैसे ? इंसान तो जन्म के साथ ही पांच कमजोरियों में जकडा हुआ है काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार तो आदमी के न चाहने पर भी अपने आप घेर लेते है | क्या कोई इंसान चाहता है कि मुझे क्रोध आये परन्तु फिर भी माया के चक्कर में फंस कर इनका गुलाम होकर रह जाता है और फिर मजबूर हो जाता है कभी वाणिक हिंसा करने को, कभी मानिसक हिंसा को और कभी कभी शारीरक हिंसा को |
परन्तु अब यहाँ पर फिर गीता प्रभु प्रेमियों का मार्ग दर्शन करती है और वैष्णव शब्द में ही इंसान द्वारा पूछे गए सवालों का उत्तर निकाल देती है | गीता में 'वैष्णव' शब्द की दूसरी परिभाषा दी गयी है :-
"जो इंसान संसार के समस्त जीवो में विष्णु को देखता है वह वैष्णव है "
एक ही वाक्य में कितनी बड़ी बात कही है , मनुष्य की हर उलझन का जवाब इस वाक्य में उपलब्द है यहाँ पर समस्त जीव का उल्लेख हुआ है यानि इंसान को इंसान के बारे मैं ही ही नहीं समझाया गया बल्कि उसको इस धरती पर पैदा हुए हर जीव चाहे वह पशु हो या पक्षी है जो भी है उस में विष्णु का ही अंश हैं| यानि जो आदर तुम अपने ईष्ट अपने प्रभु के लिए रखते हैं वही आदर सब जीवो के प्रति हो, किसी के लिए कोई द्वेष नहीं ,अच्छा करे तो कृष्ण , बुरा करे तो कृष्ण | हम किसी को अपशब्द क्यूँ कहे ?हम किसी से ईर्षा कैसे रखे ? क्या हम अपने प्रभु से ईर्षा रख सकते हैं ? तो फिर उसके अंश से क्यों ? क्या गंगा जल के प्रवाह से एक बूँद को अलग करने से वह बूँद गंगा जल नहीं रह जाती ? सोने का छोटे से छोटा टुकड़ा भी सोना ही कहलायेगा | तो फिर विष्णु का अंश भी विष्णु ही हुआ |
ये भी कृष्ण वो भी कृष्ण , मै भी कृष्ण , तू भी कृष्ण ,
कृष्ण कृष्ण राधे राधे ,राधे राधे , कृष्ण ,कृष्ण |
हर तरफ कृष्ण ही कृष्ण है | किसको अच्छा कहे किसको बुरा ? किसकी चुगली करे किसकी निंदा करे ?
लाली मेरे लाल की , जित देखूं उत् लाल
लाली देखन में गयी ,मै भी हो गयी लाल
आमीर खुसरो जी ने कितना सुंदर उद्धारण दिया है मेरे गुरु की उपमा इतनी है कि जिधर भी नज़र जाती है मुझे वो ही वो नज़र आते हैं और जब जब उनको देखने के लिए नज़र उठाता हूँ मुझे खुद में भी वो ही नज़र आते हैं
तो हर जगह तू ही तू जैसी भावना वैसा दुष्य | राम में तो राम को सब देखते हैं, रावण में भी राम को ढुढौ | मित्र से तो सब प्रेम करते हैं दुश्मन को भी प्रेम से जीतो , उसमे भी राम को देखो |
अव्वल अल्लाह नूर उपाय , कुदरत के सब बंदे,
एक नूर से सब जग उपजा , कोऊ भले कोऊ मंदे |
गुरु ग्रन्थ साहिब मैं जात पात ऊच नीच के लिए कितना सुंदर उल्लेख किया हुआ है | न कोई छोटा न ही कोई बढ़ा सब में उस परमात्मा की जोत समायी है तो मेरी मजाल, मै अपने ऊपर अभिमान करूँ या परमात्मा ने मुझे पैदा किया उसका अफ्सोस करूँ | मै भी तो उसका ही अंश हूँ जिस नूर सबकी उत्पति हुई है तो सब मेरे, मै सबका | फिर हिंसा कहाँ रह गयी न मानसिक, न वाणिक, न शारीरिक | कृष्ण ही कृष्ण , तू ही तू | अब कहाँ कमजोरी रह गयी ? न क्रोध हावी, न अहंकार हावी, न लोभ हावी, अब जो रह गयी है वह है एक प्रवर्ति "वैष्णव प्रवर्ति" | सचमुच वही वैष्णव जिसका वर्णन गीता में है |
जब हर तरफ वो ही वो नज़र आने लगता है तो उपरोक्त तीनो तरह की हिंसा स्वत ही समाप्त हो जाती है और फिर इंसान "वैष्णव" पद को प्राप्त होता है |
याद 14/10/1993
दिन ढलते ही चांद की सूरत बहुत सताती है,
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है
हाय किससे कहूं गम अपना,
हाय कैसे छुपाऊं दर्द अपना
बड़ी बेदर्द है यह दुनिया
कि बिन कहे सब जान जाती है
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है
दुश्मन भी ना पाए,
जो पाई है जिंदगी हमने
कि जिंदगी जीने के बिना उम्र कटी जाती है
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है
नहीं लगता यहां कुछ अच्छा, तुम चले आओ
हो गया है सफर रोज का लंबा, तुम चले आओ
नींद आए तो ख्वाबों में ही सही, तुम चले आओ
पलकों की दहलीज पर आंसुओं में कहीं तुम चले आओ
ना आना चाहे दिन भर के लिए
पल भर के लिए ही सही, तुम चले आओ
चले आओ चले आओ चले आओ तुम चले आओ
ना दिया साथ बाती ने तो क्या,
जिद है शमा की भी
खुद को जलाकर इंतजार में परवाने की,
सारी रात यूं ही जली जाती है
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है
तोहफा (Gift) 22/4/1996
तुम आए मेरी जिंदगी में,
तेरे आने पर गुजरे ये चार साल
कुछ खट्टी कुछ मीठी यादों के दामन में संजोये,
हमारी जिंदगी के ये चार साल
तनहा थे आवारा थे गुमनाम थे तेरे आने से पहले,
किनारे से भटकी कश्ती की पतवार थे तेरे आने से पहले
पतवार को माझी मिला और मांझी को रास्ता,
तब शुरू किए तेरे साथ सफर के ये चार साल
तुम आए मेरी जिंदगी में.
मुस्कुरा कर तुमने मुस्कुराहट दी मेरे होठों को,
हंसकर तुमने बहार दी मेरे बागों को
महक दी दो फूलों की ,
चहका दिया हर एक के दामन को
इन फूलों की मदहोशी में,
इक हंसी ख्वाब की तरह गुजरे ये चार साल
तुम आए मेरी जिंदगी में
दब जाती है कुछ खट्टी यादें,
तेरे मीठे अहसानो के नीचे
जिस तरह दब जाती थी,
मेरी झूठी नाराजगी तेरी सच्ची मुस्कानों के नीचे
बदल गए मेरे बीस सालों के मायने,
तेरे साथ गुजारे ये चार साल
तुम आए मेरी जिंदगी में
अफसोस कुछ भी ना दे सका,
तेरी कुर्बानियों का सिला मैं
सवाल थोपे बेमानी तुझ पर,
जवाब जिनका ना निकाल सका मैं
जिसको पूरा करना था बिन मांगे,
मांग कर भी ना पूरा कर सका है मैं
मैं भी दूँ कुछ फूल अपने दामन से,
इसी इच्छा में गुजरे ये चार साल
तुम आए मेरी जिंदगी में
आंसू ना आए तेरी आंखों में,
गम छु ना सके तेरी परछाई भी
फूल दे भगवान तुझे तेरी इच्छा का,
यही दुआ देकर अलविदा कह गए ये चार साल
तुम आए मेरी जिंदगी में तेरे आने पर गुजरे ये चार साल