आज जिस विषय पर हम विचार कर रहें हैं वह सीधे तौर पर हमारे रहन-सहन हमारी संस्कृति और आज की गतिशील जीवन के मूल्यों से सम्बंधित है। आज जब हम अपने को समय के साथ चलने को बाध्य करतें हैं तो कई परम्परागत विचार और शैलियां हमें बाध्क लगती हैं । जिनको हम रुढिवादी कह कर भी सम्बोधित करते हैं। क्या सभी इस तरंह के विचार या परम्पराएं हमारे आज के समाज को गतिशील रखने में बाध्क हैं, क्या इन को छोड़ कर या अपना कर हम अपने जीवन मूल्यों को बचा सकते हैं? यही आज का मूल प्रश्न है।
युगों युगांतर पहले जब इन्सान को यह समझ आने लगा कि अकेले रह कर वह दुसरे जीवों से अपनी रक्षा नहीं कर सकता तो उसने खुद को झुंड में रखना ठीक समझा ।इसी कङी में पहले परिवार फिर समाज, संगठन, कबीलों में रहना शुरू किया। इन को व्यवस्थित रखने के लिए कई तरह की समाजिक व्यवस्थाएं की गई। जिनको समय के साथ साथ विकसित भी किया गया और नगण्य होने की स्तिथि में समाप्त भी किया गया। इन में कई प्रथाओं को जैसे बाल विवाह,सती प्रथा आदि को वस्तुतः हम समाप्त कर चुके है , परन्तु कई परम्पराएं जैसे जातिवाद, बहुविवाह, दहेज प्रथा , महिलाओं के प्रति छोटी सोच आदि को सम्पूर्ण रुप से समाप्त करने में हम अक्षम हैं। हां ये परम्पराएं हमारी उन्नति में बाधक हैं । इनको समाप्त किए बिना हम खुद को विकसित नहीं कर सकते हैं।
इन सब के अलावा कई पुरानी व्यवस्थाएं जो हमारे समाजिक मूल्यो को उच्च स्थान पर पहुंचा सकतीं हैं उन्हें भी जब हम अपनी उन्नति में बाधक समझते हैं तो हम अपना ही नहीं आने वाली कई पीढ़ियों का नुक्सान करतें हैं जैसे माता पिता के प्रति हमारे कर्तव्य, एकल परिवारों की तरफ बढता हमारा रुझान चाहे वो मजबूरी में हो या एछिक , पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर भागने जैसा है। ज्यादा से ज्यादा काम अपने आप करने को हम रुढिवादी कह कर हम खुद को मशीनों के गुलाम बना रहे हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसके अलावा घर के या समाज के उत्सवों को रुढिवादी कह कर हमारी उदासीनता हमें खुशियों से दूर कर रही है ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिसमें हम अपनी पारम्परिक व्यवस्थाओ को आगे बढ़ाते हुए सुखी जीवन व्यतीत कर सकते हैं
अंत में हम इतना कह सकते हैं कि सभी रूड़ियां समाज की प्रगति में बाधक नहीं हो सकती, इन में से कई हमारे लिए प्रेरक भी हो सकती हैं । इनकी व्यवहारिकता यदि जीवन मूल्यों का हनन करने लगे तो इन्हे छोङ देना ही अच्छा है वरना ये हमारे पूर्वजों द्वारा कई वर्षो तक अपने जीवन के साथ किए प्रयोगों के निष्कर्ष के रूप में हमारे लिए प्रेरणास्रोत का कार्य कर सकती हैं।
कल्पना कविता की बुनियाद होती है ,परन्तु मेरी रचनाये किसी कल्पना से नहीं मेरे जीवन के यथार्थ से जुडी है | सुख दुःख के मोतिओं को पिरो कर बनी ये माला आपकी नज़र
Monday, 6 August 2018
रूड़ियां समाज की प्रगति में बाद्दक
Tuesday, 5 June 2018
विदाई से पहले विदाई
...पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ,
..आँसू छिपाते हो फेर कर नज़रे,
..इतना फीका मुस्कुराया न करो ..
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो
... हिदायत से घर भर की लाइट्स बुझाते ,
... न सोच कर भी कितने सामान दिलवाते,
...खाली होते पर्स को छिपाते ,
...मेरे हाथ में ए टी एम थमाया न करो ...
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
...पानी की बॉटल रखी या नही,
...टिकट कही भूली तो नही ,
...पर्स में खुले पैसे रखे या नही
..इतना नम प्यार जताया न करो ....
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
सीट के नीचे बैग जमाते ,
ध्यान रखना अकेली जा रही,
साथ की किसी महिला को बताते,
पल पल इतनी चिंता जताया न करो ...
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
पहुँचते ही कर देना फोन ,
अब कब होगा आना फिर तुम्हारा ,
रग रग कर देते हो तन्हा ,
उदासी से सर पर हाथ फिराया न करो ..
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
मैं खामोश सी हो जाती हूँ ,
जी भर ऐसे गले लगाया न करो ,
दूर तक देखती रह जाती हूँ बिखर कर,
ग़मगीन खड़े यू हाथ हिलाया न करो ,..
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
चप्पा चप्पा कर देते हो वीरान ,
रुन्धा गला बेमतलब बातो में छिपाया न करो,
मेरा आगा पीछा सोच सोच ,
अपना कलेजा दुखाया न करो,......
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
लो बात करो कहकर फ़ोन माँ को देकर ,
बाद में पूछते उनसे एक एक बात मेरी ,
बरसो पुराना मोबाइल रखकर ,
हमारे नाम पाई पाई के कागज़ संजोया न करो
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।