Sunday, 8 June 2014

खबर

न गेसू सवारे, न लट सुलझाई
न पहनी नथनिया, न सुरखी़ लगाई
कि उनके आने की खबर उनके आने के बाद आई ||
धूप में यु ही औंधी पडी थी, चुनरी कहीं और चोली कहीं थी ,
आंख बन्द कर ख्वाबो में उनसे मिलने गई थी ,
आहट पर उनकी जो आंख झपकाई ,
सामने उनको पा मैं बहुत शरमाई ,
कि उनके आने की खबर उनके आने के बाद आई
पास आ कर उन्होने पकडी कलाई,
पहले गेसु सवारें फिर चुनरी उठाई,
अपने होठों की सुरखी मेरे होठों पे लगाई,
न कुछ वो बोले न मैं बोल पाई,
आंखो ने आंखो को ये दास्तां सुनाई,
बिन तेरे सजन कैसे बीती जुदाई,
न पलक उनकी झपकी न मेंने झपकाई,
ऐसे में चौखट पे डाक बाबू नें आवाज लगाई,
खत ले उन्होने अपने आने की खबर पढ सुनाई,
मुस्कराये वो तब मेरे होंठो पे हंसी आई,
मजबूरी मेरी तब उनकी समझ में आई,
कि उनके आने की खबर उनके आने के बाद आई |||

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