टूटते तारे की बुझती हुई लौ में,
देखने वालों ने चिंगारी देखी
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
झूठ ना कह पाया कभी,
ना तोङा दिल कभी किसी का,
फिर भी मुझमें मेरे अपनो ने मक्कारी देखी,
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
झुकती रही कमर,
जिन्दगी के बोझ से
झुकती रही नजर,
अहसानों के बोझ में,
मेरी खामोशी में भी अपनो ने जुबांतरारी देखी
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
कुछ कर गुजरने की उम्मीद में,
न जाने क्या क्या कर गए हम
जिन्दगी में मुकाम हासिल करते करते,
कईओ की नजरों से उतर गए हम
मिल बैठने में भी अब तो लोगो की नागवारी देखी,
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
टूट गया हूं मैं,
कोई तो आकर संभाले मुझको
चीर कर सीना धरती का,
आंचल में छुपा ले मुझको ,
वज़ह तो न बन पाया किसी के सकूं की,
क़ोई बेवजह ही गले से लगा ले मुझको ।
क़ोई बेवजह ही गले से लगा ले मुझको ।
वफ़ादारी की इंतेहा के बाद जब मिलीं नजरें
उन नजरों में भी न इक पल की शुक्रगुज़ारी देखी ।
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी।
ना थी जो कभी मुझ में,
मेरे अपनो ने वो मुझ में होशियारी देखी,
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