तु 'भयमुक्त' 'चिन्तामुक्त' 'ईर्षामुक्त' और 'द्वेषमुक्त' हो कर मेरी शरणागत हो जा और अपने द्वारा किए सभी कर्म मुझे समर्पित कर दे और घटने वाले सभी घटनाकर्म को मेरी इच्छा मान कर स्वीकार कर के यह समझ ले कि जो होगा उसमें तुम्हारा ही हित है, यही सुखी और शान्त जीवन जीने का मूल उपाय है।
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