Thursday, 9 January 2020

याद 14/10/1993

दिन ढलते ही चांद की सूरत बहुत सताती है,
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है

हाय किससे कहूं गम अपना,
हाय कैसे छुपाऊं दर्द अपना
बड़ी बेदर्द है यह दुनिया
कि बिन कहे सब जान जाती है
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है 

दुश्मन भी ना पाए,
जो पाई है जिंदगी हमने
कि जिंदगी जीने के बिना उम्र कटी जाती है  
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है  

नहीं लगता यहां कुछ अच्छा,               तुम चले आओ
हो गया है सफर रोज का लंबा,             तुम चले आओ
नींद आए तो ख्वाबों में ही सही,            तुम चले आओ
पलकों की दहलीज पर आंसुओं में कहीं तुम चले आओ
ना आना चाहे दिन भर के लिए
पल भर के लिए ही सही,                     तुम चले आओ
चले आओ चले आओ चले आओ         तुम चले आओ

ना दिया साथ बाती ने तो क्या,
जिद है शमा की भी
खुद को जलाकर इंतजार में परवाने की,
सारी रात यूं ही जली जाती है
तुम तो चले जाते हो तुम्हारी याद बहुत आती है

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