आज हम अगर किसी से पूछते है कि भाई आप शाकाहारी है या मासाहारी तो वह यदि मांस का सेवन न करता होगा तो वह कह देगा कि हम तो शाकाहारी है और यदि पूछा जाये कि क्या आप वैष्णव है तो मांस न खाने वाले तपाक से कहेगे हाँ हम वैष्णव है हम मांस मिदरा का सेवन बिलकुल नहीं करते अब यहाँ सवाल यह उठता है कि हर शाकाहारी प्राणी वैष्णव है ? आखिर वैष्णव की परिभाषा क्या है ? गीता में बड़े सुंदर ढंग से वैष्णव के बारे में समझाया गया है "जो प्राणी शरीर मन और वाणी से किसी की हिंसा नहीं करता है वह वैष्णव है " यहाँ पर तीन तरह की हिंसा का उल्लेख हुआ है १: शारीरक हिंसा,मानिसक हिंसा तथा वाणिक हिंसा |
शारीरक हिंसा अर्थार्त अपने शरीर के किसी भी अंग हाथ पैर आदि से किसी को चोट पहुचाना या उसे मारना मानिसक हिंसा अर्थार्त अपने मन में किसी के लिए भी इर्षा द्वेष रखना | मान लो हमने मन में यह विचार किया कि अमूक आदमी का बुरा हो जाये या वह बहुत तर्रकी कर रहा है, भगवान करे उसका काम बिगड़ जाये तो इसमें आपने शारीरक रूप से तो कुछ नहीं किया परंतु मन में इस तरह का विचार रखकर एक तरह से हिंसा ही की है तीसरी प्रकार की हिंसा वाणी की हिंसा बताई गयी है किसी को कहे गए कठोर शब्द जिस से सामने वाले को मानिसक रूप से नुक्सान पहुंचे या अपने अभिमान में कहे शब्द या किसी की निंदा के लिए कहे शब्द चाहे वह उसके पीछे ही क्यूँ न कहे गए हो एक तरह की हिंसा ही है |
गीता में इन तीनो प्रकार की हिंसा का त्याग करने वाले को ही वैष्णव कहा गया है | केवल शाकाहारी होने से ही इंसान वैष्णव नहीं हो जाता | मान लीजिए आप मांस का सेवन तो नहीं करते परन्तु आपके मन में अभिमान ईर्षा द्वेष ने घर बना रखा है और वाणी मैं कठोरता हैं तो ऐसा शाकाहारी होना भी किस काम का ?
अब यहाँ सवाल यह उठाया जाता है कि इतनी परिपवक्ता आये कैसे ? इंसान तो जन्म के साथ ही पांच कमजोरियों में जकडा हुआ है काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार तो आदमी के न चाहने पर भी अपने आप घेर लेते है | क्या कोई इंसान चाहता है कि मुझे क्रोध आये परन्तु फिर भी माया के चक्कर में फंस कर इनका गुलाम होकर रह जाता है और फिर मजबूर हो जाता है कभी वाणिक हिंसा करने को, कभी मानिसक हिंसा को और कभी कभी शारीरक हिंसा को |
परन्तु अब यहाँ पर फिर गीता प्रभु प्रेमियों का मार्ग दर्शन करती है और वैष्णव शब्द में ही इंसान द्वारा पूछे गए सवालों का उत्तर निकाल देती है | गीता में 'वैष्णव' शब्द की दूसरी परिभाषा दी गयी है :-
"जो इंसान संसार के समस्त जीवो में विष्णु को देखता है वह वैष्णव है "
एक ही वाक्य में कितनी बड़ी बात कही है , मनुष्य की हर उलझन का जवाब इस वाक्य में उपलब्द है यहाँ पर समस्त जीव का उल्लेख हुआ है यानि इंसान को इंसान के बारे मैं ही ही नहीं समझाया गया बल्कि उसको इस धरती पर पैदा हुए हर जीव चाहे वह पशु हो या पक्षी है जो भी है उस में विष्णु का ही अंश हैं| यानि जो आदर तुम अपने ईष्ट अपने प्रभु के लिए रखते हैं वही आदर सब जीवो के प्रति हो, किसी के लिए कोई द्वेष नहीं ,अच्छा करे तो कृष्ण , बुरा करे तो कृष्ण | हम किसी को अपशब्द क्यूँ कहे ?हम किसी से ईर्षा कैसे रखे ? क्या हम अपने प्रभु से ईर्षा रख सकते हैं ? तो फिर उसके अंश से क्यों ? क्या गंगा जल के प्रवाह से एक बूँद को अलग करने से वह बूँद गंगा जल नहीं रह जाती ? सोने का छोटे से छोटा टुकड़ा भी सोना ही कहलायेगा | तो फिर विष्णु का अंश भी विष्णु ही हुआ |
ये भी कृष्ण वो भी कृष्ण , मै भी कृष्ण , तू भी कृष्ण ,
कृष्ण कृष्ण राधे राधे ,राधे राधे , कृष्ण ,कृष्ण |
हर तरफ कृष्ण ही कृष्ण है | किसको अच्छा कहे किसको बुरा ? किसकी चुगली करे किसकी निंदा करे ?
लाली मेरे लाल की , जित देखूं उत् लाल
लाली देखन में गयी ,मै भी हो गयी लाल
आमीर खुसरो जी ने कितना सुंदर उद्धारण दिया है मेरे गुरु की उपमा इतनी है कि जिधर भी नज़र जाती है मुझे वो ही वो नज़र आते हैं और जब जब उनको देखने के लिए नज़र उठाता हूँ मुझे खुद में भी वो ही नज़र आते हैं
तो हर जगह तू ही तू जैसी भावना वैसा दुष्य | राम में तो राम को सब देखते हैं, रावण में भी राम को ढुढौ | मित्र से तो सब प्रेम करते हैं दुश्मन को भी प्रेम से जीतो , उसमे भी राम को देखो |
अव्वल अल्लाह नूर उपाय , कुदरत के सब बंदे,
एक नूर से सब जग उपजा , कोऊ भले कोऊ मंदे |
गुरु ग्रन्थ साहिब मैं जात पात ऊच नीच के लिए कितना सुंदर उल्लेख किया हुआ है | न कोई छोटा न ही कोई बढ़ा सब में उस परमात्मा की जोत समायी है तो मेरी मजाल, मै अपने ऊपर अभिमान करूँ या परमात्मा ने मुझे पैदा किया उसका अफ्सोस करूँ | मै भी तो उसका ही अंश हूँ जिस नूर सबकी उत्पति हुई है तो सब मेरे, मै सबका | फिर हिंसा कहाँ रह गयी न मानसिक, न वाणिक, न शारीरिक | कृष्ण ही कृष्ण , तू ही तू | अब कहाँ कमजोरी रह गयी ? न क्रोध हावी, न अहंकार हावी, न लोभ हावी, अब जो रह गयी है वह है एक प्रवर्ति "वैष्णव प्रवर्ति" | सचमुच वही वैष्णव जिसका वर्णन गीता में है |
जब हर तरफ वो ही वो नज़र आने लगता है तो उपरोक्त तीनो तरह की हिंसा स्वत ही समाप्त हो जाती है और फिर इंसान "वैष्णव" पद को प्राप्त होता है |
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